Sunday, December 8, 2013

ख़ुशी

बेहद ख़ुशी के लम्हों से भरा रहा मेरा आज का दिन …देश में नयी लहर का पहला अहसास जिसका इंतज़ार देश कई सालों से  कर रहा था। कांग्रेस के अस्त के साथ नयी आम पार्टी का जबरदस्त तरीके से आगमन एक नए बदलाव कि इबारत लिखने को तैयार है. और  बीजेपी कि शानदार जीत अगले छः महीने के अपने आगामी भविष्य के पहले कदम के तौर जनता के सामने है. सचमुच देश की जनता में जागरूकता है यह आज साबित होता नज़र आ रहा है।

Monday, September 9, 2013

sabse bara phisala

कड़कड़ा ती ठण्ड की वो काली रात जिसके साए में एक जघन्य अपराध ने अपना घिनौना चेहरा पेश किया।  यकीनन ही आज फैसले का समय निकट आ गया है. और टकटकी लगाए करोड़ों आँखें इन्साफ की उम्मीद लगाए बैठी है. …… . उन 6 बेनक़ाब चेहरों से परदे तो उठ गये.….   लेकिन यकिनन ही आरोपियों को उनकी मुकम्मल सज़ा नहीं मिल पायी है।  नौ महीने के लम्बे समय के बाद जिस तरह क़ानून ने आरोपियों को सजा सुनाई  वो कहीं ना कहीं मीडिया और हमारे हक़ की लड़ाई का फैसला रहा …लेकिन सोचने की जरुरत है कि अगर मेट्रो पौलिटन सिटी में हुए अपराध और जनाक्रोश के प्रदर्शन के बाद नौ महीने का समय लगता है तो उन छोटे शहरों के हालात का अंदाजा भर लगाया जा\ सकता है.… जहां मामलें दर्ज कराने में भी पुलिसिया निकम्मापन अपना रोल अदा करता है. … ज्यादातर मामलों में तो इन बेहद संगीन अपराधों को या तो घर के चार दिवारी से बाहर निकलने नहीं दिया जाता। … अगर किसी ने हिम्मत कर भी ली तो केस पुलिस फाइलों में ही सिमटकर रह जाती है और अगर फैसले आगे बढे भी तो क़ानून की फाँस में दब कर दम तोड़  देती है. … मिडिया के पुरजॊर कोशिशों के बाद इस मामले ने अपना रास्ता खोजा भी और अंजाम के बेहद नजदीक भी आज पहुंच चूका है…. लेकिन मानसिकता पर लगाम और भय  उन अपराधियों पर कोई असर होता नहीं दिख पहूच गया . …. लेकिन बदलाव अभी भी कोसों दूर है.तभी तो दिल्ली की गैंगरेप की घटना के बाद भी दिल्ली, मुंबई, नॉएडा और कई राज्यों में ऐसे अपराध लगातार होने की खबरें आतीं रहीं। लेकिन हम सिर्फ सरकार,  क़ानून , पुलिस को दोष ना दें क्योंकि गलती कही ना कहीं हम  आम लोगों की भी है. जब ऐसे कुकर्मों को जानते समझते हम या तो उसपर पर्दा डालने की कोशिश  करते है या मुंह  फेरकर निकलना पसंद करते है…. अगर ऐसा नहीं होता तो उस दिन उस पीडिता और उसके साथी की मदद को इतना समय नहीं लगता। आज इस फैसले के साथ साथ एक और फैसले पर भी ग़ौर किया जाना  बेहद जरूरी है की मदद करने वालों को गुनेहगार के दायरे  से दूर रखा जाए और यकिन जानिये इससे बदलाव आयेगा. …
 . मानवता बची रहे और कोशिशें जारी रहें  ये  उस  उस अदम्य पीडिता की गुहार है,इसलिए   अपराधी को नहीं अपराध की सजा मुकम्म्मल हो 

Monday, September 2, 2013

kaanoon bana apradhiyon ka panaahgaah

छोटी उम्र का दायरा। …… या अपराधियों के कुकर्मों का पनाहगाह  …… अंतर कुछ ज्यादा  नहीं है ….  देश में हालिया ही हुए दो अपराध के लिए अपराधी ने उम्र का सहारा लिया और सच मानिए यह हौसला  अपराधियों को यक़ीनन जुवेनाइल एक्ट के सरीखे ही आते होंगे।   16 दिसम्बर  को हुए दरिंदगी के लिए महज तीन साल की सज़ा उन मानसिक रोगियों के लिए एक मुकम्म्मल रास्ते जैसा दिख रहा होगा जिसपर चलकर वे जघन्यता की सीमाओं से परे जाने का भरसक प्रयास करेंगे। भारतीय  क़ानून में ऐसे कुकृत्य के लिए संशोधन का प्रावधान होना चहिये। … एक बढ़ा जनाक्रोश का कारण भी हर परिपेक्ष में  सही है। …   .  भारत में हुए इस अपराध के लिए सबसे पहले क़ानून में बदलाव होने चाहिए थे और उसके बाद फैसले को जनभावनाओं के पटल पर रख कर संतुलित तरीके से लिया जाना चाहिए था। । क्योंकि भारत में कई क़ानूनविदों का भी यही मानना रहा कि ऐसे अपराधों के लिए सबसे पहले तो उम्र की बाध्यता को हटा कर एडल्ट की श्रेणी में रख दिया जाना चहिये। …क्योकि ऐसा करने से ना सिर्फ क़ानून ही मजबूत होगा साथ ही उम्र को हथियार बना कर  किये जाने वाले अपराध पर भी अंकुश लग पायेगा। 
















कुक्रित्त्य     भारतीय क़ानून के मानदंडो पर भरोसे से बढ़ जाता है 

Wednesday, August 14, 2013

pyaz politics

वाह  प्याज़ वाह तेक्रे या कह्ने…. यह  एक बड़ा ही विचित्र मूल है.…. जिसकी हैसियत सिर्फ निवाले तक नहीं है बल्कि यह अकेला सियासत को बदलने की ताकत रखता है।  इस प्याज़ के क्या कहने। … कभी तो यह लॉकर तक जा पहुचता है तो कभी नेताओं के गिरेबान मैं झूलता नज़र आता है  … कभी तो बरस सकी हैसियत कर सत्ता का मज़ा लुटता है.… तो कभी onion election के नाम से खुद को अमर कर जाता है….  कभी तो ढुलमुल सरकार को रुलाने में भी कामयाब होता है.……  और कभी तो बिरोधी को अपने बहाने सत्ता काबिज कराने के सपने तक दिखता है।   यह प्याज़ प्याज़ नहीं .…… मानो  नेताओं की क़ाबलियत का पैमाना  तय करने का बड़ा  कारण  बन बैठा है.…अपने  तहों की तरह कितनों को बेपर्द करता मालुम होता है. …. . एक तरफ प्याज़ की तरह ही कांग्रेस भी मतदान से पहले रोता नज़र आता है और इलेक्शन के बाद सत्ता का लज़ीज़ स्वाद लेता नज़र आता है। वहीँ दूसरी तरफ बीजेपी की सपने दिखाकर रोने पर  मजबूर कर जाता है… इनके अदब में कुछ न कहियेगा …अब यह गरीब के थाली की शान नहीं बल्कि अमीरों की मल्कियत बन बैठा  है.…….

Wednesday, August 7, 2013

nyaypurn sansad

आज का संसद या फिर एक हंगामेंदार अखारा जो चाहे कह लीजिये …. 30  वर्षों से  सामान्यतः यह एक परंपरा का रूप ले चुकी है.……  चर्चा करने के  मुकम्मल तरीके में कमी और सदन स्थगित करने का  उद्देश्य किस तरह देश की प्रगति में बाधक बन पड़ी है.…. इसका अंदाजा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि 30  वर्षो में  मात्र एक तिहाई बिल ही लोकसभा में  पास हो पायें हैं। … भारतीय संसद को मिश्र के बजाय इंगलैंड की तरह  सशक्त होने की जरुरत है…. सभापति और स्पीकर को अपने अधिकारों का पूर्ण प्रयोग तो करना ही चहिये… धारा 193 ,184 को बेहतर तरीके से लागू किया जाना चहिये. … छोटे-छोटे  मुद्दों पर होने वाले all party meeting में आम सहमती और उदारपूर्ण तरीके से  फैसले लिए जाने चहिये… साथ ही मतदान   की प्रक्रिया के माध्यम से बातों को रखने के बाद …  अतिमहत्वपूर्ण मुद्दों पर ही बहस की जानी चाहिए। … नेताओं को अपनी  आचरण  का ऐसा उदाहण पेश करना चाहिए जो कि जनता की नज़र में खुद को शर्मशार होने से बचता हो… …… 

Sunday, May 26, 2013

chunauti ke do saal

सत्ता के दो साल और कई चुनौतियों से दो-दो हाथ करने के बाद  ममता दीदी ने परिवर्तन के दो साल भी पूरे कर लिए हैं     डिनर पार्टी के जरिये पार्टी के नेताओं का हौसला अफजाई भी की ....टीएमसी यु तो लोकतान्त्रिक ढाचा है और नेताओं की अच्छी  खासी जमात भी है। दो वर्षों का वक्त एक बुरी अर्थव्यवस्था से लेकर जंगल राज तक का सफ़र के खात्मे के लिए यकिनान ही काबिलेतारीफ कहा जायेगा। जीडीपी के आंकडे में बंगाल अकेले २४ सालों का रिकोर्ड तोर कर 7 .6 %तक पहुच गया ... कृषि और उधोग में विकास दर भी 2. 56 तक जा चूका है. परिसेवा का विकाश दर भी 9 .4 8 रहा जो की अन्य राज्यों से कही आगे है।

Thursday, February 21, 2013

ek akela insaan

रिश्ते बड़े हैं जरुरी ....खट्टी मीठी यादों के सहारे कट जायेंगे , ढाढस बढ़ाते कुछ हाथ ,कुछ साथ ....ज़िन्दगी कभी जोगी जी की जगह रखकर पल भर सोचने की कोशिश की  तो कांप  जाता है मन ... भगवान का इन्साफ देखिये लम्बी उम्र का तोहफा दे डाला और उसे ढोने के लिए लाखों तकलीफें  .


(जोगी जी  -एक  नौकर जिसका काम है कुत्तों का रखरखाव  )

जब भी मासूम सा चेहरा दिखा
तब-तब सोचने को मजबूर हुए हम
कभी तुझे नजदीक से सुनने का मौका मिला
और दुःख के समंदर में उतरते गए हम

गवई भाषा के कुछ शब्द ही समझ पाए होंगे
लेकिन अहसास उतना ही आत्मियता का
जिससे आँखें नाम होने में वक़्त नहीं लगता
जिन्दगी में तो गलतियाँ सबने की
 पर कुछ को ऐसा फल क्यों मिला ?
ताउम्र अकेलापन और सिरहाने कोई सहारा नहीं
उम्र के इस पड़ाव  पर अब कोई गवारा नहीं

लोगों ने कहा जिद्दी है लोगों ने कहा अड़ियल स्वभाव
कौन है जो जिद्दी नहीं ? कौन है जो अडता नहीं  ?
कुछ (खुशकिस्मतों ) के लिए कुछ बचा रह गया
कुछ (बदकिस्मत ) के लिए कुछ रहा ही नहीं

क्या साँसे चलना ही जिंदगी है
दर्द बांटने  के लिए कुत्तों के सिवा कोई नहीं
इंसान से बेहतर जानवरों का सलूक काबिलेतारीफ
अपने रिश्तों का कोई सहारा  नहीं 
गलतियों से जी चुराया तो वक़्त ने साथ छोर  दिया
रिश्तें बनाने की उम्मीद पर  वक़्त ने मन तोर दिया 

बातों से बचपन झलकता और आँखों से बुढ़ापा
इमानदारी की तीखी रोर और कांपते हाथों  में अब भी सहारा 
बूढी आँखों में लम्बी उदासी और  वक़्त का लम्बा तकाज़ा
अब तो किस्मत मान कर ही हम वक़्त काटतें जा रहे हैं


                                                                        अवंतिका झा


Thursday, February 14, 2013

valentine special

"   पिया ओ पिया सवारिया .............
   तु सामने और तुझसे मिलने को तरसे जिया "

  तुझसे अलग नहीं है ये भी सही है
  रब के हाथों सौप दिए मैंने हर सपने
मेरा वो इश्क है जिसमे शब्द नहीं है

किसी शर्त  के बिना दिल दे दिया
तू सामने और तुझसे मिलने को तरसे जिया

कितने मजबूर , अब कोई प्रश्न  नहीं है
तेरे होठों की खुशी में  मेरी खुशी है
किस्मत मान लिया है मैंने
कोई शिकायत नहीं है  
 
सारी यादें खो गयी, कोई गम नहीं है
एक तू रहे मेरे साथ इतना याकी है

 किसी स्वार्थ के बिना  प्यार  किया
 तू सामने और तुझसे मिलने को तरसे जिया
                                                                         अवंतिका झा
   

  

Friday, February 8, 2013

 मोदी और राहुल के बीच की जंग आगे 2014 के लिए भी उतनी ही तजा बहस होगी जितनी की आज के लिए है। राहुल का उपाध्यक्ष बनाया जाना गले की ऐसी हड्डी से कम नहीं है लिकिन जब कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी के लिए यह किसी बड़े समारोह से कम नहीं था। उधर मोदी का बीजेपी का अध्यक्ष बनाया जाना उस लहजे से कबिलेताफिफ ही कहा जायेगा जब पार्टी के सभी बड़े दिग्गजों में आम सहमती से लिया गया निर्णय था। जी हाँ एक प्रखर  उम्रदराज और अनुभवी व्यक्ति जिससे बड़ी बागडौर सम्हालने की उम्मीद की जा सकती है  और इसीलिए  भावी भविष्य में प्रधानमंत्री बनाने की कवायते तेज़ हो गयी है। लेकिन मसला इतना आसन नहीं है जितना की दिख रहा है।

Wednesday, January 23, 2013

सरकार की नयी मोनोपोली

बढती कीमत का रोना रोती  एक तरफ आम जनता है और दूसरी  तरफ पेट्रो कम्पनियां। पर सवाल यह उठता है कि सरकार  के लिए  देश की  जनता ज्यादा मायने रखती है या तेल कंपनियों का मुनाफा ... लेकिन आम जनता को तेल कंपनियों के मुनाफे से क्या लेना देना उन्हें तो अपनी  जेब की पड़ी  है। देश की  अर्थव्यवस्था को बढाने का मसला भी काफी अहम् है और हल दोनों के बीच से निकलना भी जरुरी है। सरकार की विफलता लगातार 2007 से 20013 तक लगातार {8 रु} दामों में बढ़ोतरी से साफ  नजर आ रही है और लगातार विरोध का स्वर झेल रही सरकार ने कीमतें  बढानें का फैसला अब तेल कंपनियों के कन्धों पर डा ल दिया है। पर इसमें भी सरकार ने  तेल कंपनियों को  मामूली बढ़ोतरी का हक़ दिया है। सब्सिडी का रोना रोती कम्पनियाँ सेंसेक्स में हुए उछाल के बावजूद घाटे की बात कह रही है। दैनिक जरूरतों पर बढ़ती सब्सिडी का रोना रोती सरकार जिसकी  जीडीपी में 7.6 से गिरावट 5.6 तक पहुच गयी है । पेट्रो प्रोडक्ट्स पर टैक्स कितना लगाया जाए इसका निर्णय राज्य और केंद्र सरकार दोनों के हाथों में होता है।केंद्र को 2.5 लाख  और राज्य को एक लाख का टैक्स अदा करना पड़ता है। लेकिन बिल में कमी और नियति में खोटेपन की वजह से दोनों ही सरकारें मोनोपोली चला रही है। मामले की गंभीरता को देखते हुए ग्रामीणों के लिए किरोसिन में रियायत और मध्यमवर्गीय परिवारों को 6 की जगह 9 सिलिंडर का दिखावा करती सरकार देश की  जनता के बढते आक्रोश से बचने का हल ढूढ़ रही है।

 बहरहाल महंगाई पर विरोध पर्याप्त नहीं अब जनविरोधी कदम उठने लगे हैं और इसके लिए जरुरी है कि सरकार अन्य वस्तुओं पर टैक्स बढ़ाये। लेकिन देखा जाये तो भारत एक ऐसा देश है जहाँ हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में टैक्स भरता है। भारत जैसे देश में एक भिख मांगने वाला  भी रोटी  के लिए सरकार को टैक्स अदा  करता है। केंद्र को  70 करोड़ पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के लिए ,1.80 करोड़ किरोसिन और 90 हजार डीजल में टैक्स देना पड़ता है . कारण है पूरा निवेश नहीं और वृद्धि में कमी , इन वजहों के कारण  लम्बे समय से लचर अर्थव्यवस्था, वित्तीय खामियाजा और   पॉलिसी मेकिंग में फंसी राजनीति बढती कीमतों का सबसे बड़ा कारण  है। कम्पनियाँ कहती है की 1 रु बढाने से सरकार को 9 रु का फायदा होता है जबकि 2011 -12 में 16 लाख करोड़ पेट्रो और 8 लाख  70 हजार करोड़ का फायदा किरोसिन से हुआ ... अब जरुरी है कि सरकार के नुमायिन्दों के लिए सरकारी  खर्च कम किये जाए और आम जनता को राहत दी जाए। इसलिए रेविन्यु बढ़ाया जाए और खर्च में कमी की जाए। आर्थिक संकट से जूझता देश अपनी नीतियों में परिवर्तन लाकर हल निकाले।
                 देश की राजनीति या संविधान के नियमों में सुधार की जरुरत इस मुद्दे को लेकर भी है क्योकि सियासत के खेल में दोनों शीर्ष पार्टियाँ अपने अपने टैक्स अदायगी को लेकर खीचतान की स्थिति में है। और सरकार  के मनोबल का इससे अच्छा प्रमाण नहीं मिल सकता की बढती कीमतों जैसे कड़े और बड़े फैसलों पर सरकार को की डर नहीं है। क्योंकि सरकार यह जानती है कि चुनावों की बिसाद भारत में मुख्यतःजातिवाद पर है।  इसलिए जनता को यह समझना होगा की व्यर्थ के जातिवाद से ऊपर उठकर अपने हक़ के लिए जागरूक रहे ताकि सरकार सियासत से ज्यादा आम जनता के हित के बारे में सोच सके।