बढती कीमत का रोना रोती एक तरफ आम जनता है और दूसरी तरफ पेट्रो कम्पनियां। पर सवाल यह उठता है कि सरकार के लिए देश की जनता ज्यादा मायने रखती है या तेल कंपनियों का मुनाफा ... लेकिन आम जनता को तेल कंपनियों के मुनाफे से क्या लेना देना उन्हें तो अपनी जेब की पड़ी है। देश की अर्थव्यवस्था को बढाने का मसला भी काफी अहम् है और हल दोनों के बीच से निकलना भी जरुरी है। सरकार की विफलता लगातार 2007 से 20013 तक लगातार {8 रु} दामों में बढ़ोतरी से साफ नजर आ रही है और लगातार विरोध का स्वर झेल रही सरकार ने कीमतें बढानें का फैसला अब तेल कंपनियों के कन्धों पर डा ल दिया है। पर इसमें भी सरकार ने तेल कंपनियों को मामूली बढ़ोतरी का हक़ दिया है। सब्सिडी का रोना रोती कम्पनियाँ सेंसेक्स में हुए उछाल के बावजूद घाटे की बात कह रही है। दैनिक जरूरतों पर बढ़ती सब्सिडी का रोना रोती सरकार जिसकी जीडीपी में 7.6 से गिरावट 5.6 तक पहुच गयी है । पेट्रो प्रोडक्ट्स पर टैक्स कितना लगाया जाए इसका निर्णय राज्य और केंद्र सरकार दोनों के हाथों में होता है।केंद्र को 2.5 लाख और राज्य को एक लाख का टैक्स अदा करना पड़ता है। लेकिन बिल में कमी और नियति में खोटेपन की वजह से दोनों ही सरकारें मोनोपोली चला रही है। मामले की गंभीरता को देखते हुए ग्रामीणों के लिए किरोसिन में रियायत और मध्यमवर्गीय परिवारों को 6 की जगह 9 सिलिंडर का दिखावा करती सरकार देश की जनता के बढते आक्रोश से बचने का हल ढूढ़ रही है।
बहरहाल महंगाई पर विरोध पर्याप्त नहीं अब जनविरोधी कदम उठने लगे हैं और इसके लिए जरुरी है कि सरकार अन्य वस्तुओं पर टैक्स बढ़ाये। लेकिन देखा जाये तो भारत एक ऐसा देश है जहाँ हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में टैक्स भरता है। भारत जैसे देश में एक भिख मांगने वाला भी रोटी के लिए सरकार को टैक्स अदा करता है। केंद्र को 70 करोड़ पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के लिए ,1.80 करोड़ किरोसिन और 90 हजार डीजल में टैक्स देना पड़ता है . कारण है पूरा निवेश नहीं और वृद्धि में कमी , इन वजहों के कारण लम्बे समय से लचर अर्थव्यवस्था, वित्तीय खामियाजा और पॉलिसी मेकिंग में फंसी राजनीति बढती कीमतों का सबसे बड़ा कारण है। कम्पनियाँ कहती है की 1 रु बढाने से सरकार को 9 रु का फायदा होता है जबकि 2011 -12 में 16 लाख करोड़ पेट्रो और 8 लाख 70 हजार करोड़ का फायदा किरोसिन से हुआ ... अब जरुरी है कि सरकार के नुमायिन्दों के लिए सरकारी खर्च कम किये जाए और आम जनता को राहत दी जाए। इसलिए रेविन्यु बढ़ाया जाए और खर्च में कमी की जाए। आर्थिक संकट से जूझता देश अपनी नीतियों में परिवर्तन लाकर हल निकाले।
देश की राजनीति या संविधान के नियमों में सुधार की जरुरत इस मुद्दे को लेकर भी है क्योकि सियासत के खेल में दोनों शीर्ष पार्टियाँ अपने अपने टैक्स अदायगी को लेकर खीचतान की स्थिति में है। और सरकार के मनोबल का इससे अच्छा प्रमाण नहीं मिल सकता की बढती कीमतों जैसे कड़े और बड़े फैसलों पर सरकार को की डर नहीं है। क्योंकि सरकार यह जानती है कि चुनावों की बिसाद भारत में मुख्यतःजातिवाद पर है। इसलिए जनता को यह समझना होगा की व्यर्थ के जातिवाद से ऊपर उठकर अपने हक़ के लिए जागरूक रहे ताकि सरकार सियासत से ज्यादा आम जनता के हित के बारे में सोच सके।
बहरहाल महंगाई पर विरोध पर्याप्त नहीं अब जनविरोधी कदम उठने लगे हैं और इसके लिए जरुरी है कि सरकार अन्य वस्तुओं पर टैक्स बढ़ाये। लेकिन देखा जाये तो भारत एक ऐसा देश है जहाँ हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में टैक्स भरता है। भारत जैसे देश में एक भिख मांगने वाला भी रोटी के लिए सरकार को टैक्स अदा करता है। केंद्र को 70 करोड़ पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के लिए ,1.80 करोड़ किरोसिन और 90 हजार डीजल में टैक्स देना पड़ता है . कारण है पूरा निवेश नहीं और वृद्धि में कमी , इन वजहों के कारण लम्बे समय से लचर अर्थव्यवस्था, वित्तीय खामियाजा और पॉलिसी मेकिंग में फंसी राजनीति बढती कीमतों का सबसे बड़ा कारण है। कम्पनियाँ कहती है की 1 रु बढाने से सरकार को 9 रु का फायदा होता है जबकि 2011 -12 में 16 लाख करोड़ पेट्रो और 8 लाख 70 हजार करोड़ का फायदा किरोसिन से हुआ ... अब जरुरी है कि सरकार के नुमायिन्दों के लिए सरकारी खर्च कम किये जाए और आम जनता को राहत दी जाए। इसलिए रेविन्यु बढ़ाया जाए और खर्च में कमी की जाए। आर्थिक संकट से जूझता देश अपनी नीतियों में परिवर्तन लाकर हल निकाले।
देश की राजनीति या संविधान के नियमों में सुधार की जरुरत इस मुद्दे को लेकर भी है क्योकि सियासत के खेल में दोनों शीर्ष पार्टियाँ अपने अपने टैक्स अदायगी को लेकर खीचतान की स्थिति में है। और सरकार के मनोबल का इससे अच्छा प्रमाण नहीं मिल सकता की बढती कीमतों जैसे कड़े और बड़े फैसलों पर सरकार को की डर नहीं है। क्योंकि सरकार यह जानती है कि चुनावों की बिसाद भारत में मुख्यतःजातिवाद पर है। इसलिए जनता को यह समझना होगा की व्यर्थ के जातिवाद से ऊपर उठकर अपने हक़ के लिए जागरूक रहे ताकि सरकार सियासत से ज्यादा आम जनता के हित के बारे में सोच सके।
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