अपनों का भ्रम
मेरे टूटे हुए रिश्तों
मेरी मज्बुरियां समझो
ज़माने के तशहुद ( जिन्दगी) से मुझे आगाह करते हो
मगर मैं वो न कहने पर भला किस तरह छुप जाऊं
जिसे कहकर मैं अपने दिल की खल्बतों (एकांत ) की चोर बन जाऊं
टुकड़े-टुकड़े बटी परेशानियों ने याद दिलाई
बदनामियों के सघन घटाओं ने याद दिलाई
एक और दुनिया खोज रही
कहाँ खो गया मेरा बचपन है
दर्द में अपनी सुबहो-शाम
जिसमे बीत गये कई बरष
थक गए अब तो दिमाग और तन
मिल जाये एक उन्मुक्त गगन
चाहे -अनचाहे अपनों ने मुह मोर लिया
जमीर की कसौटी पर न जाने हमने क्या पाप किया
एक दर्द जो आँख में छटपटाती है बहुत
दूसरी दुनियां के बढती शोखियों से क्या गिला
जिन घरों में नींद से लम्बी हैं रातें आज भी
उन घरों में प्यार के किस्से भी कुछ मिल जायेंगे
जब मिजाज लिखता है कि शरीर
एक बुत की तरह रह जायेगा
सारे अपनों के पास अफशोस के सिवा
कुछ न बच पायेगा
प्यार से ज़ुरा हुआ माना की ख्याल हूँ
शक से न देखिये की मैं तो इन्कलाब हूँ
अवंतिका झा
मेरे टूटे हुए रिश्तों
मेरी मज्बुरियां समझो
ज़माने के तशहुद ( जिन्दगी) से मुझे आगाह करते हो
मगर मैं वो न कहने पर भला किस तरह छुप जाऊं
जिसे कहकर मैं अपने दिल की खल्बतों (एकांत ) की चोर बन जाऊं
टुकड़े-टुकड़े बटी परेशानियों ने याद दिलाई
बदनामियों के सघन घटाओं ने याद दिलाई
एक और दुनिया खोज रही
कहाँ खो गया मेरा बचपन है
दर्द में अपनी सुबहो-शाम
जिसमे बीत गये कई बरष
थक गए अब तो दिमाग और तन
मिल जाये एक उन्मुक्त गगन
चाहे -अनचाहे अपनों ने मुह मोर लिया
जमीर की कसौटी पर न जाने हमने क्या पाप किया
एक दर्द जो आँख में छटपटाती है बहुत
दूसरी दुनियां के बढती शोखियों से क्या गिला
जिन घरों में नींद से लम्बी हैं रातें आज भी
उन घरों में प्यार के किस्से भी कुछ मिल जायेंगे
जब मिजाज लिखता है कि शरीर
एक बुत की तरह रह जायेगा
सारे अपनों के पास अफशोस के सिवा
कुछ न बच पायेगा
प्यार से ज़ुरा हुआ माना की ख्याल हूँ
शक से न देखिये की मैं तो इन्कलाब हूँ
अवंतिका झा
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