खूद से ही बेताकलूफ़
कहाँ जाएँ सच कहें बस वहां जाए
जहां न कोई रिश्ता हो न हो कोई आस
न झूठे अपनों का बंधन , न गले में हो फाँस
न खुद को साबित करने का हठ
न ब्याह के रिश्तों मैं घूट -घूट कर रहने का मठ
न शरीर के दर्द को सम्हालने वाला कोई
न पागल होने की दशा की खिल्ली उड़ाने वाला कोई
खुद को ढूंढ़ती हूँ मैं हमेशा
कभी घर की तंग चारदीवारी में
कभी बहार जलती चिंगारी मैं
कभी आशुओं के धारों में
कभी झूट के सहारों में
कभी अपनी आकंचाओं में
कभी अपने निराशाओं में
कभी अतीत के गलियारों में
कभी भविष्य के बहारों में
दर्दे-मर्ज नहीं संभालते नहीं मेरी हथेली में
टिककर नहीं रहते अब तो आँखों में
अवंतिका झा
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