Sunday, November 4, 2012

मेरी माँ अम्मा

                                                                      मेरी   माँ  अम्मा 

चुपके-चुपके जाने कैसे कर देती है तुरपाई अम्मा
खुद बिना सहारे कैसे हिम्मत बढ़ा देती  है अम्मा

कभी मेरी कमियां छुपाते देखा, कभी अपनी बेबसी छुपाते देखा
घर से बहार तक हांफते हर दायित्व निभाते देखा

माथे पर पड़ी सिलवटें ना जाने कितने दर्द लिए
आँखों में देखूं तो सालों  की पीड़ा के पर्त लिए

मैं घर से निकलती होंगी दुआ भी साथ चलती होगी
उसकी कोशिशें -ए -जुवां में मजबूरी भी उसपर हंसती होगी

चादर को सिलते-सिलते थक गए अब  उसके हाथ
फिर भी हाथों की गर्माहट ना जाने दिलाते कैसा विश्वास

एक छोटी सी दर्द पर सर सहलाते देखा
चार दिवारी के अन्दर खुद को अनचाहे रमाते देखा

अपनी आँखों की कोरों में आंसुओं को समहालते  देखा
हमने तो कई रातें उसे जागते करवटे  बदलते देखा

उधेरबुन  करता  निकलता जा रहा है उसका वक़्त 
अपने अरमानों के लिए नहीं मिली उसे कभी फुरसत

 धुंधली होती नज़रों के आगे बस एक अन्धकार भविष्य
बस छोटी सी उम्र में  ही तो  सम्हाला था उसने अपना दायित्व

घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधरते देखे
बच्चों को बुलंदी देने की कवायद उसे करते देखे
                                                                            अवंतिका झा

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