कड़कड़ा ती ठण्ड की वो काली रात जिसके साए में एक जघन्य अपराध ने अपना घिनौना चेहरा पेश किया। यकीनन ही आज फैसले का समय निकट आ गया है. और टकटकी लगाए करोड़ों आँखें इन्साफ की उम्मीद लगाए बैठी है. …… . उन 6 बेनक़ाब चेहरों से परदे तो उठ गये.…. लेकिन यकिनन ही आरोपियों को उनकी मुकम्मल सज़ा नहीं मिल पायी है। नौ महीने के लम्बे समय के बाद जिस तरह क़ानून ने आरोपियों को सजा सुनाई वो कहीं ना कहीं मीडिया और हमारे हक़ की लड़ाई का फैसला रहा …लेकिन सोचने की जरुरत है कि अगर मेट्रो पौलिटन सिटी में हुए अपराध और जनाक्रोश के प्रदर्शन के बाद नौ महीने का समय लगता है तो उन छोटे शहरों के हालात का अंदाजा भर लगाया जा\ सकता है.… जहां मामलें दर्ज कराने में भी पुलिसिया निकम्मापन अपना रोल अदा करता है. … ज्यादातर मामलों में तो इन बेहद संगीन अपराधों को या तो घर के चार दिवारी से बाहर निकलने नहीं दिया जाता। … अगर किसी ने हिम्मत कर भी ली तो केस पुलिस फाइलों में ही सिमटकर रह जाती है और अगर फैसले आगे बढे भी तो क़ानून की फाँस में दब कर दम तोड़ देती है. … मिडिया के पुरजॊर कोशिशों के बाद इस मामले ने अपना रास्ता खोजा भी और अंजाम के बेहद नजदीक भी आज पहुंच चूका है…. लेकिन मानसिकता पर लगाम और भय उन अपराधियों पर कोई असर होता नहीं दिख पहूच गया . …. लेकिन बदलाव अभी भी कोसों दूर है.तभी तो दिल्ली की गैंगरेप की घटना के बाद भी दिल्ली, मुंबई, नॉएडा और कई राज्यों में ऐसे अपराध लगातार होने की खबरें आतीं रहीं। लेकिन हम सिर्फ सरकार, क़ानून , पुलिस को दोष ना दें क्योंकि गलती कही ना कहीं हम आम लोगों की भी है. जब ऐसे कुकर्मों को जानते समझते हम या तो उसपर पर्दा डालने की कोशिश करते है या मुंह फेरकर निकलना पसंद करते है…. अगर ऐसा नहीं होता तो उस दिन उस पीडिता और उसके साथी की मदद को इतना समय नहीं लगता। आज इस फैसले के साथ साथ एक और फैसले पर भी ग़ौर किया जाना बेहद जरूरी है की मदद करने वालों को गुनेहगार के दायरे से दूर रखा जाए और यकिन जानिये इससे बदलाव आयेगा. …
. मानवता बची रहे और कोशिशें जारी रहें ये उस उस अदम्य पीडिता की गुहार है,इसलिए अपराधी को नहीं अपराध की सजा मुकम्म्मल हो
. मानवता बची रहे और कोशिशें जारी रहें ये उस उस अदम्य पीडिता की गुहार है,इसलिए अपराधी को नहीं अपराध की सजा मुकम्म्मल हो
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