Monday, November 26, 2012

अपनों का भ्रम

                                                                            अपनों का भ्रम 

मेरे टूटे हुए रिश्तों
मेरी मज्बुरियां  समझो
ज़माने के तशहुद ( जिन्दगी) से मुझे आगाह करते हो
मगर मैं वो न कहने पर भला किस तरह छुप जाऊं
जिसे कहकर मैं अपने दिल की खल्बतों (एकांत ) की चोर बन जाऊं
 टुकड़े-टुकड़े बटी परेशानियों  ने याद दिलाई
 बदनामियों के सघन घटाओं ने याद दिलाई
एक और दुनिया खोज रही
कहाँ खो गया मेरा बचपन है
दर्द में अपनी सुबहो-शाम
जिसमे बीत गये कई बरष
थक गए अब तो दिमाग और तन
मिल जाये एक उन्मुक्त गगन
चाहे -अनचाहे अपनों ने मुह मोर लिया
जमीर की कसौटी पर न जाने हमने क्या पाप किया
एक दर्द जो आँख में छटपटाती  है बहुत
दूसरी दुनियां के बढती शोखियों से क्या गिला
जिन घरों में नींद से लम्बी हैं रातें आज भी
उन घरों में प्यार के किस्से भी कुछ मिल जायेंगे 
जब मिजाज लिखता है कि शरीर
एक बुत की तरह रह जायेगा
सारे अपनों के पास अफशोस के सिवा
कुछ न बच  पायेगा
 प्यार से ज़ुरा हुआ माना  की ख्याल हूँ
शक से न देखिये की मैं तो इन्कलाब हूँ

                                                            अवंतिका झा

Sunday, November 25, 2012

खूद से ही बेताकलूफ़


                                                                खूद से ही बेताकलूफ़ 
कहाँ जाएँ सच कहें बस वहां जाए
जहां न कोई रिश्ता हो न हो कोई आस
न झूठे अपनों का बंधन , न गले में हो फाँस

न खुद को साबित करने का हठ
न ब्याह के रिश्तों मैं घूट -घूट कर रहने का मठ

न शरीर के दर्द को सम्हालने वाला कोई
न पागल होने की दशा की खिल्ली उड़ाने वाला कोई

खुद को ढूंढ़ती हूँ मैं हमेशा
कभी घर की तंग चारदीवारी में
कभी बहार जलती चिंगारी मैं
 कभी आशुओं के धारों में
कभी झूट के सहारों में
कभी अपनी आकंचाओं में
कभी अपने निराशाओं में
कभी अतीत के गलियारों में
कभी भविष्य के बहारों में

दर्दे-मर्ज नहीं संभालते नहीं मेरी हथेली में
टिककर नहीं रहते अब तो आँखों  में

                                                                    अवंतिका झा


खाली हाथ

                                                                      खाली हाथ 

आपको मुझसे गिला होता ना शिकवा होता ,
मेरी मजबूरी गर आपने समझा होता

दर्द की याद में भी दर्द है ये बेहतर था
अपने ग़मों का हिसाब गर हमने रखा होता

ख्वाब देखे थे जो हमने वो सभी सच होते
सोचिये ऐसा होता तो कैसा होता

आज जो नहीं दिखते उनकी आँखों में एक बूंद आंशु
गर हमने भी अपना जूनून न खोया होता

अपने गम से कहीं ज्यादा सताता है दूसरों का गम
गर उस वक़्त हमने भी  अपनों के बारे में सोचा होता।

                                                                             अवंतिका झा 

Sunday, November 4, 2012

मेरी माँ अम्मा

                                                                      मेरी   माँ  अम्मा 

चुपके-चुपके जाने कैसे कर देती है तुरपाई अम्मा
खुद बिना सहारे कैसे हिम्मत बढ़ा देती  है अम्मा

कभी मेरी कमियां छुपाते देखा, कभी अपनी बेबसी छुपाते देखा
घर से बहार तक हांफते हर दायित्व निभाते देखा

माथे पर पड़ी सिलवटें ना जाने कितने दर्द लिए
आँखों में देखूं तो सालों  की पीड़ा के पर्त लिए

मैं घर से निकलती होंगी दुआ भी साथ चलती होगी
उसकी कोशिशें -ए -जुवां में मजबूरी भी उसपर हंसती होगी

चादर को सिलते-सिलते थक गए अब  उसके हाथ
फिर भी हाथों की गर्माहट ना जाने दिलाते कैसा विश्वास

एक छोटी सी दर्द पर सर सहलाते देखा
चार दिवारी के अन्दर खुद को अनचाहे रमाते देखा

अपनी आँखों की कोरों में आंसुओं को समहालते  देखा
हमने तो कई रातें उसे जागते करवटे  बदलते देखा

उधेरबुन  करता  निकलता जा रहा है उसका वक़्त 
अपने अरमानों के लिए नहीं मिली उसे कभी फुरसत

 धुंधली होती नज़रों के आगे बस एक अन्धकार भविष्य
बस छोटी सी उम्र में  ही तो  सम्हाला था उसने अपना दायित्व

घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधरते देखे
बच्चों को बुलंदी देने की कवायद उसे करते देखे
                                                                            अवंतिका झा