बेहद ख़ुशी के लम्हों से भरा रहा मेरा आज का दिन …देश में नयी लहर का पहला अहसास जिसका इंतज़ार देश कई सालों से कर रहा था। कांग्रेस के अस्त के साथ नयी आम पार्टी का जबरदस्त तरीके से आगमन एक नए बदलाव कि इबारत लिखने को तैयार है. और बीजेपी कि शानदार जीत अगले छः महीने के अपने आगामी भविष्य के पहले कदम के तौर जनता के सामने है. सचमुच देश की जनता में जागरूकता है यह आज साबित होता नज़र आ रहा है।
tamanna
Sunday, December 8, 2013
Sunday, September 15, 2013
Monday, September 9, 2013
sabse bara phisala
कड़कड़ा ती ठण्ड की वो काली रात जिसके साए में एक जघन्य अपराध ने अपना घिनौना चेहरा पेश किया। यकीनन ही आज फैसले का समय निकट आ गया है. और टकटकी लगाए करोड़ों आँखें इन्साफ की उम्मीद लगाए बैठी है. …… . उन 6 बेनक़ाब चेहरों से परदे तो उठ गये.…. लेकिन यकिनन ही आरोपियों को उनकी मुकम्मल सज़ा नहीं मिल पायी है। नौ महीने के लम्बे समय के बाद जिस तरह क़ानून ने आरोपियों को सजा सुनाई वो कहीं ना कहीं मीडिया और हमारे हक़ की लड़ाई का फैसला रहा …लेकिन सोचने की जरुरत है कि अगर मेट्रो पौलिटन सिटी में हुए अपराध और जनाक्रोश के प्रदर्शन के बाद नौ महीने का समय लगता है तो उन छोटे शहरों के हालात का अंदाजा भर लगाया जा\ सकता है.… जहां मामलें दर्ज कराने में भी पुलिसिया निकम्मापन अपना रोल अदा करता है. … ज्यादातर मामलों में तो इन बेहद संगीन अपराधों को या तो घर के चार दिवारी से बाहर निकलने नहीं दिया जाता। … अगर किसी ने हिम्मत कर भी ली तो केस पुलिस फाइलों में ही सिमटकर रह जाती है और अगर फैसले आगे बढे भी तो क़ानून की फाँस में दब कर दम तोड़ देती है. … मिडिया के पुरजॊर कोशिशों के बाद इस मामले ने अपना रास्ता खोजा भी और अंजाम के बेहद नजदीक भी आज पहुंच चूका है…. लेकिन मानसिकता पर लगाम और भय उन अपराधियों पर कोई असर होता नहीं दिख पहूच गया . …. लेकिन बदलाव अभी भी कोसों दूर है.तभी तो दिल्ली की गैंगरेप की घटना के बाद भी दिल्ली, मुंबई, नॉएडा और कई राज्यों में ऐसे अपराध लगातार होने की खबरें आतीं रहीं। लेकिन हम सिर्फ सरकार, क़ानून , पुलिस को दोष ना दें क्योंकि गलती कही ना कहीं हम आम लोगों की भी है. जब ऐसे कुकर्मों को जानते समझते हम या तो उसपर पर्दा डालने की कोशिश करते है या मुंह फेरकर निकलना पसंद करते है…. अगर ऐसा नहीं होता तो उस दिन उस पीडिता और उसके साथी की मदद को इतना समय नहीं लगता। आज इस फैसले के साथ साथ एक और फैसले पर भी ग़ौर किया जाना बेहद जरूरी है की मदद करने वालों को गुनेहगार के दायरे से दूर रखा जाए और यकिन जानिये इससे बदलाव आयेगा. …
. मानवता बची रहे और कोशिशें जारी रहें ये उस उस अदम्य पीडिता की गुहार है,इसलिए अपराधी को नहीं अपराध की सजा मुकम्म्मल हो
. मानवता बची रहे और कोशिशें जारी रहें ये उस उस अदम्य पीडिता की गुहार है,इसलिए अपराधी को नहीं अपराध की सजा मुकम्म्मल हो
Monday, September 2, 2013
kaanoon bana apradhiyon ka panaahgaah
छोटी उम्र का दायरा। …… या अपराधियों के कुकर्मों का पनाहगाह …… अंतर कुछ ज्यादा नहीं है …. देश में हालिया ही हुए दो अपराध के लिए अपराधी ने उम्र का सहारा लिया और सच मानिए यह हौसला अपराधियों को यक़ीनन जुवेनाइल एक्ट के सरीखे ही आते होंगे। 16 दिसम्बर को हुए दरिंदगी के लिए महज तीन साल की सज़ा उन मानसिक रोगियों के लिए एक मुकम्म्मल रास्ते जैसा दिख रहा होगा जिसपर चलकर वे जघन्यता की सीमाओं से परे जाने का भरसक प्रयास करेंगे। भारतीय क़ानून में ऐसे कुकृत्य के लिए संशोधन का प्रावधान होना चहिये। … एक बढ़ा जनाक्रोश का कारण भी हर परिपेक्ष में सही है। … . भारत में हुए इस अपराध के लिए सबसे पहले क़ानून में बदलाव होने चाहिए थे और उसके बाद फैसले को जनभावनाओं के पटल पर रख कर संतुलित तरीके से लिया जाना चाहिए था। । क्योंकि भारत में कई क़ानूनविदों का भी यही मानना रहा कि ऐसे अपराधों के लिए सबसे पहले तो उम्र की बाध्यता को हटा कर एडल्ट की श्रेणी में रख दिया जाना चहिये। …क्योकि ऐसा करने से ना सिर्फ क़ानून ही मजबूत होगा साथ ही उम्र को हथियार बना कर किये जाने वाले अपराध पर भी अंकुश लग पायेगा।
कुक्रित्त्य भारतीय क़ानून के मानदंडो पर भरोसे से बढ़ जाता है
कुक्रित्त्य भारतीय क़ानून के मानदंडो पर भरोसे से बढ़ जाता है
Wednesday, August 14, 2013
pyaz politics
वाह प्याज़ वाह तेक्रे या कह्ने…. यह एक बड़ा ही विचित्र मूल है.…. जिसकी हैसियत सिर्फ निवाले तक नहीं है बल्कि यह अकेला सियासत को बदलने की ताकत रखता है। इस प्याज़ के क्या कहने। … कभी तो यह लॉकर तक जा पहुचता है तो कभी नेताओं के गिरेबान मैं झूलता नज़र आता है … कभी तो बरस सकी हैसियत कर सत्ता का मज़ा लुटता है.… तो कभी onion election के नाम से खुद को अमर कर जाता है…. कभी तो ढुलमुल सरकार को रुलाने में भी कामयाब होता है.…… और कभी तो बिरोधी को अपने बहाने सत्ता काबिज कराने के सपने तक दिखता है। यह प्याज़ प्याज़ नहीं .…… मानो नेताओं की क़ाबलियत का पैमाना तय करने का बड़ा कारण बन बैठा है.…अपने तहों की तरह कितनों को बेपर्द करता मालुम होता है. …. . एक तरफ प्याज़ की तरह ही कांग्रेस भी मतदान से पहले रोता नज़र आता है और इलेक्शन के बाद सत्ता का लज़ीज़ स्वाद लेता नज़र आता है। वहीँ दूसरी तरफ बीजेपी की सपने दिखाकर रोने पर मजबूर कर जाता है… इनके अदब में कुछ न कहियेगा …अब यह गरीब के थाली की शान नहीं बल्कि अमीरों की मल्कियत बन बैठा है.…….
Wednesday, August 7, 2013
nyaypurn sansad
आज का संसद या फिर एक हंगामेंदार अखारा जो चाहे कह लीजिये …. 30 वर्षों से सामान्यतः यह एक परंपरा का रूप ले चुकी है.…… चर्चा करने के मुकम्मल तरीके में कमी और सदन स्थगित करने का उद्देश्य किस तरह देश की प्रगति में बाधक बन पड़ी है.…. इसका अंदाजा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि 30 वर्षो में मात्र एक तिहाई बिल ही लोकसभा में पास हो पायें हैं। … भारतीय संसद को मिश्र के बजाय इंगलैंड की तरह सशक्त होने की जरुरत है…. सभापति और स्पीकर को अपने अधिकारों का पूर्ण प्रयोग तो करना ही चहिये… धारा 193 ,184 को बेहतर तरीके से लागू किया जाना चहिये. … छोटे-छोटे मुद्दों पर होने वाले all party meeting में आम सहमती और उदारपूर्ण तरीके से फैसले लिए जाने चहिये… साथ ही मतदान की प्रक्रिया के माध्यम से बातों को रखने के बाद … अतिमहत्वपूर्ण मुद्दों पर ही बहस की जानी चाहिए। … नेताओं को अपनी आचरण का ऐसा उदाहण पेश करना चाहिए जो कि जनता की नज़र में खुद को शर्मशार होने से बचता हो… ……
Sunday, May 26, 2013
chunauti ke do saal
सत्ता के दो साल और कई चुनौतियों से दो-दो हाथ करने के बाद ममता दीदी ने परिवर्तन के दो साल भी पूरे कर लिए हैं डिनर पार्टी के जरिये पार्टी के नेताओं का हौसला अफजाई भी की ....टीएमसी यु तो लोकतान्त्रिक ढाचा है और नेताओं की अच्छी खासी जमात भी है। दो वर्षों का वक्त एक बुरी अर्थव्यवस्था से लेकर जंगल राज तक का सफ़र के खात्मे के लिए यकिनान ही काबिलेतारीफ कहा जायेगा। जीडीपी के आंकडे में बंगाल अकेले २४ सालों का रिकोर्ड तोर कर 7 .6 %तक पहुच गया ... कृषि और उधोग में विकास दर भी 2. 56 तक जा चूका है. परिसेवा का विकाश दर भी 9 .4 8 रहा जो की अन्य राज्यों से कही आगे है।
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