अपनी साख पर इतराने के हक़ से वंचित हिंदी .... का हाल भारत के उस उत्तरपूर्वी प्रदेश की तरह से नजर आता है जो अलग -थलग दिखाई देती है। मसलन विश्वविद्यालयों को आवंटित राशि में हिंदी अध्धयन की किताबों पर राशि की कमी और कम्प्यूटरीकृत कॉलेजों को मिलने वाली राशि अघोषित है। उत्तर भारत में हिंदी की जड़ें मजबूत तो हैं लेकिन बाज़ार में अंग्रेज़ी से प्रतिस्पर्धा करता हिंदी आज के पीढी की सबसे बड़ी परेशानी है। शिक्षा एक आधिकारिक कानून के तौर पर खड़ा तो है लेकिन इसकी स्थिति स्वस्थ्य नहीं है। उदाहरण के तौर पर बच्चों में अभिव्यक्ति की कला के साथ अन्य भाषायों का अंतर्विरोध बच्चे के मासूम मन पर सवाल छोडता है कि बाजारी प्रतिस्पर्धा और अंतराभिव्यक्ति का द्वंद आखिर न ख़त्म होने वाला प्रश्न है। कोठारी साहब की अध्यक्षता में बना त्रिशिक्षा फोर्मूलें की सिफारिश सराहनीय है। क्योकिं अभिव्यक्ति के लिए मातृभाषा ,अभिव्यक्ति और ज्ञान विज्ञान के लिए राष्ट्रभाषा और ज्ञान विज्ञान और बाजारी प्रतिस्पर्धा के लिए अंग्रेजी का साथ आवश्यक है। पत्रकारिता ने हिंदी प्रचार प्रसार में अहम् भूमिका निभाते हुए देश और विदेशों में झंडे तो गाडे लेकिन बोलचाल वाली हिंदी अब पत्रकारिता के नए विषय में शामिल हो चुकी है। क्लिष्ट हिंदी अनिवार्य नहीं है लेकिन समृद्ध हिंदी से दूरी मीडिया ने अवश्य करवा दी है।।खासकर उपाधियों और उपमाओं के तौर पर हिंदी का हाल एक मरीज़ की तरह हो चला है। मनोरंजन जगत में भी हिंदी का पूर्ण आधिपत्य या वास्तविक स्वरुप देखने को कम ही मिलता है। बहरहाल, मेरी अपनी समझ के अनुसार किसी भी वस्तू, या माध्यम से प्रेम उसे
समृद्ध बनाने में पहले कदम की तरह काम करता है बाद में हिंदी माध्यम का
समृद्ध और बाजारीकरण स्वयं हो जाना निर्विवाद है।
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