भारतीय ज़ज्बात के संचार का साधन हिंदी जी हां राष्ट्रभाषा की उपाधि लिए अपने अस्तित्व को बचा पाने में असफल हिंदी को इस दौर में काफ़ी मुश्किलों से दो -चार होना पर रहा है . अवसर की समानता मोटे तौर पर या नाममात्र के लिए मौजूद तो है ,लेकिन भीतर बडी विसमताओं से व्याप्त हिंदी एक वर्गीय विभाजन का ग्रास बना हुआ है .अपनी अधिकारिकता को जमीनी हकीकत से दूर पाता हिंदी खंडित भाषाओं की कतार में है। ..विविधताओं में एकता इसके लिए कहीं न कहीं जिम्मेवार दिखता है ....क्षेत्रीय भाषाओँ के जाल में और नए राज्य भाषाओं की राजनीति में हिंदी को गहरा शिकार होना पडा है।हिंदी के निर्माताओं में भारतेंदु हरिश्चंद्र उन चुनिन्दा रचनाकारों में शुमार किये जाते है जिन्होंने अपनी वैचारिकता और चिंतन से हिंदी को सृजनात्मक रूप दिया . उस वक्त के सभी चिंतकों ने अपने निबंध, कथा, नाटक, और समालोचनओं से हिंदी साहित्य को विविध नवीन और व्यापक रूप प्रदान किया। 60 करोड़ लोगों की भाषा होने के साथ दुनिया की दूसरी और तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में शुमार है हिंदी । प्रारंभिक अवस्था में हिंदी का उर्दू और शुद्ध हिंदी को आज देवनागरी लिपि में स्वीकारा जा चूका है लेकिन आज भी इसे प्रतिस्पर्धा के तौर पर नहीं रखा गया है।भारत के दक्षिण, उत्तर-पूर्व, पश्चिम हर जगह अपनी भाषाओं का भारत में बोलबाला है और इन सबके बीच हिंदी अपना दम तोडता नज़र आ रहा है। बंगाल में बंगाली, उत्तर-पूर्वी राज्यों में पाश्चात्य का बोलबाला , दक्षिण भारत में प्रादेशिक भाषाओं के बीच हिंदी अपनी साख खोता नज़र आता है। हिंदी के इतिहास और समृद्धि के तौर पर हिंदी जानकारों का मानना है की हिंदी को ही आधिकारिकता और समावेशी होना चाहिए , लेकिन यह संघर्ष हिंदी के मूल में भी शामिल था। जब अच्छे बुद्धिजीवियों ने भी इसकी पैरवी की थी। हिंदी में शोध ,अच्छे लेखन, और अध्धयन सामग्री की कमी भी हिंदी को हाशिये की और धकेल रहा है।जो नीतियाँ बने वे मुख्यतः उच्चतर नवधनिक वर्ग को ही पूरा समाज मानकर चलाई जा रही है।
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