वाह प्याज़ वाह तेक्रे या कह्ने…. यह एक बड़ा ही विचित्र मूल है.…. जिसकी हैसियत सिर्फ निवाले तक नहीं है बल्कि यह अकेला सियासत को बदलने की ताकत रखता है। इस प्याज़ के क्या कहने। … कभी तो यह लॉकर तक जा पहुचता है तो कभी नेताओं के गिरेबान मैं झूलता नज़र आता है … कभी तो बरस सकी हैसियत कर सत्ता का मज़ा लुटता है.… तो कभी onion election के नाम से खुद को अमर कर जाता है…. कभी तो ढुलमुल सरकार को रुलाने में भी कामयाब होता है.…… और कभी तो बिरोधी को अपने बहाने सत्ता काबिज कराने के सपने तक दिखता है। यह प्याज़ प्याज़ नहीं .…… मानो नेताओं की क़ाबलियत का पैमाना तय करने का बड़ा कारण बन बैठा है.…अपने तहों की तरह कितनों को बेपर्द करता मालुम होता है. …. . एक तरफ प्याज़ की तरह ही कांग्रेस भी मतदान से पहले रोता नज़र आता है और इलेक्शन के बाद सत्ता का लज़ीज़ स्वाद लेता नज़र आता है। वहीँ दूसरी तरफ बीजेपी की सपने दिखाकर रोने पर मजबूर कर जाता है… इनके अदब में कुछ न कहियेगा …अब यह गरीब के थाली की शान नहीं बल्कि अमीरों की मल्कियत बन बैठा है.…….
Wednesday, August 14, 2013
Wednesday, August 7, 2013
nyaypurn sansad
आज का संसद या फिर एक हंगामेंदार अखारा जो चाहे कह लीजिये …. 30 वर्षों से सामान्यतः यह एक परंपरा का रूप ले चुकी है.…… चर्चा करने के मुकम्मल तरीके में कमी और सदन स्थगित करने का उद्देश्य किस तरह देश की प्रगति में बाधक बन पड़ी है.…. इसका अंदाजा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि 30 वर्षो में मात्र एक तिहाई बिल ही लोकसभा में पास हो पायें हैं। … भारतीय संसद को मिश्र के बजाय इंगलैंड की तरह सशक्त होने की जरुरत है…. सभापति और स्पीकर को अपने अधिकारों का पूर्ण प्रयोग तो करना ही चहिये… धारा 193 ,184 को बेहतर तरीके से लागू किया जाना चहिये. … छोटे-छोटे मुद्दों पर होने वाले all party meeting में आम सहमती और उदारपूर्ण तरीके से फैसले लिए जाने चहिये… साथ ही मतदान की प्रक्रिया के माध्यम से बातों को रखने के बाद … अतिमहत्वपूर्ण मुद्दों पर ही बहस की जानी चाहिए। … नेताओं को अपनी आचरण का ऐसा उदाहण पेश करना चाहिए जो कि जनता की नज़र में खुद को शर्मशार होने से बचता हो… ……
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