आशंकाओं और आन्दोलन के बीच झूलता देश उस दौराहे पर आ खडा हुआ है जहाँ से निश्चित तौर पर यह तो कहा ही जा सकता है की बदलाव का समय अब ज्यादा दूर नहीं है। राजनीति और आन्दोलन का रास्ता अलग-अलग होता है. सामाजिक जीवन का लम्बा अनुभव रखने वाले अन्ना समझौते से दूर की राजनीति करने में विश्वाश रखते है, वहीं अरविन्द केजरीवाल गर्मजोशी से आन्दोलन का मार्ग प्रशस्त करना चाहते हैं अनिवार्यतः ही समझौते आन्दोलन को कमजोर बनाते हैं। लेकिन कीचड़ में ही फूल खिलने में विश्वाश रखने वाले केजरीवाल का मानना है कि किचड़ में घुसकर गन्दगी साफ करने से सफाई होगी ना कि किनारे खड़े होकर नारे लगाने से .... मतों में भिन्नता का उदहारण गाँधी और सुभाष की तरह ही है। इसलिए वैचारिक मतभेद आन्दोलन पर सवाल उठाने की हिमाकत तो कर रहा है। अधीरता और संयम का टकराव यक़ीनन ही जरुरी है और सही भी ...अधीरता इसलिए क्योकि भ्रष्ट सरकार के बुलंद होते हौसले की रफ़्तार कहीं देश को सालों पीछे न धकेल दे। क्रांति के शंखनाद का दौर आ चूका है और लोगों का साथ भी भरपूर है लेकिन फूट ने राजनीतिक दलों के हौसले बढ़ा दिया हैं। केजरीवाल देश को राजनितिक विकल्प देने की राह पर हैं वे संसदीय राजनीति से देश की मौजूदा व्यवस्था को बदलने की बात कर रहे हैं। अन्ना के सामने राजनीति में कदम रखने से पहले कई सवाल है। पैसा, पार्टी, उम्मीदवारों के लिए चयन और योग्य उम्मीदवारों का चयन कैसे , भ्रष्टता से अलग पार्टी का गठन। अन्ना और भूतपुर्व टीम के आन्दोलन की तुलना किसी और पार्टी से नहीं की जा सकती लेकिन मतों के विरोध में अन्ना की कोशिश अब आन्दोलन को गहरा और व्यापक करने में नजर आती है। लोकतंत्र की सफलता वास्तव में जनता की जागरूकता पर निर्भर करता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हुए मौजूदा राजनितिक दलों की रीति-निति से असंतुस्ट जनता के सामने सवाल खड़ा था .... कि नए सिरे से उस रणनीति की खोज जिसमे देश खुल कर सांस ले पाएगा .....लेकिन सब ख़त्म ... अन्ना की भूतपूर्व पार्टी के अलख में कल्पना की जाने लगी थी कि जनता के नारे नहीं उछाले जायेंगे बल्कि आम आदमी की सुनी भी जाएगी ...देखा जाए तो दोनों एक दू सरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। बेहतर तो यही होता कि सभी यानि किरण जैसी कानूनी जानकार अन्ना जैसे तजुर्बेकार समाजसेवक , केजरीवाल जैसे प्रखर राजनीतिज्ञ और विश्वास जैसे बुद्दिमान युवा नेता ,और कई ईमानदार देशभक्त की फौज एक साथ होती तो यह पार्टी सम्पूर्ण और विश्वसनीय होती । ------------ अवन्तिका झा
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