Monday, October 8, 2012

M-FACTOR

M- FACTOR ---- जी हाँ मौजूदा राजनीति में एम फैक्टर यानि ममता, मुलायम और मायावती आज उस प्यादे तरह हैं जिसपर देश की राजनीति की पूरी बिसाद बिछी हुई है। कांग्रेस के रणनीतिकार चाहे कितने भी  दावे कर ले कि सरकार को कोई संकट नहीं है लेकिन सच्चाई यह है कि ममता के सरकार से समर्थन वापस लेते ही संकट के बदल घिर आए है। कांग्रेस  के पास मुलायम हैं कांग्रेस के पास मुलायम और मायावती को  बाहरी  समर्थन तो है लेकिन तीनों ही अपने राजनीतिक   हित को ध्यान में रखते हुए अपने नफे-नुकसान की तौल पर सरकार का वजन बढ़ाएगी या घटाएगी। ममता का रिटेल में डीआआई , डीजल ,एलपीजी  की बढती कीमतों को लेकर समर्थन वापस लेना ... उनकी छवि को देशप्रेमी तो जरुर बनाती है। यह फैसला उन्हें कितना फायदा दिलाएगा यह तो आने वाले विधानसभा चुनाव में ही पता चल पायेगा। सरकार के तीन साल के कार्यकाल को जनविरोधी सरकार बताते हुए अपने फैसले को सही ठहराया है। ममता का मानना  है कि महंगाई और भ्रष्टाचार  के मुद्दों पर अन्य सहयोगी दलों को भी खामियाजा उठाना पड़ेगा।लेकिन अपने इस फैसले से उन्होंने अपने राष्ट्रीय परिदृश्य में जगह बनाने की कोशिश की है।  उनकी प्रमुख चुनौती वामपंथियों को दुबारा सत्ता में काबिज़ होने से रोकना है। कांग्रेस का साथ छोड़ना  उनके लिए नुकसानदेह  भी हो सकता है
                               मुलायम अपने पत्ते अभी खोलना नहीं चाहते वे फ्रंट में रहकर छेत्रिय दलों की मजबूती के साथ गैर-भाजपा और गैर- कांग्रेस सरकार आने की स्थिति में वे अपना नफा -नुकसान  देखकर चाल चलने के मूड में है। 

Sunday, October 7, 2012

viroodhabhaash ki bali chadhata desh

आशंकाओं और आन्दोलन के बीच झूलता देश उस दौराहे पर आ खडा हुआ है जहाँ से निश्चित तौर पर यह तो कहा ही जा सकता है की बदलाव का समय अब ज्यादा दूर नहीं है। राजनीति और आन्दोलन का रास्ता अलग-अलग होता है. सामाजिक जीवन का लम्बा अनुभव रखने वाले अन्ना समझौते से दूर की राजनीति करने में विश्वाश रखते है,  वहीं अरविन्द केजरीवाल गर्मजोशी से आन्दोलन का मार्ग प्रशस्त करना चाहते हैं अनिवार्यतः ही समझौते आन्दोलन को कमजोर बनाते हैं। लेकिन कीचड़ में ही फूल खिलने में विश्वाश रखने वाले केजरीवाल का  मानना है कि किचड़ में घुसकर गन्दगी साफ करने से सफाई होगी ना कि किनारे खड़े होकर नारे लगाने से ....  मतों में भिन्नता  का उदहारण गाँधी और सुभाष की तरह ही है। इसलिए वैचारिक मतभेद आन्दोलन पर सवाल  उठाने  की हिमाकत तो कर रहा है। अधीरता और संयम का टकराव यक़ीनन ही जरुरी है और सही  भी ...अधीरता  इसलिए क्योकि भ्रष्ट सरकार  के  बुलंद होते हौसले की रफ़्तार कहीं देश को सालों पीछे न धकेल दे। क्रांति के  शंखनाद का दौर आ चूका है और लोगों का साथ भी भरपूर है लेकिन फूट ने राजनीतिक दलों के हौसले बढ़ा दिया  हैं। केजरीवाल देश को राजनितिक विकल्प देने की राह पर हैं वे संसदीय राजनीति से   देश की मौजूदा व्यवस्था को बदलने की बात कर रहे हैं। अन्ना के सामने राजनीति में कदम रखने से पहले कई सवाल है। पैसा, पार्टी,  उम्मीदवारों के लिए चयन और योग्य उम्मीदवारों का चयन कैसे , भ्रष्टता  से अलग  पार्टी  का गठन। अन्ना और  भूतपुर्व टीम के आन्दोलन की तुलना किसी और पार्टी से नहीं की  जा सकती  लेकिन मतों के विरोध में अन्ना की कोशिश अब आन्दोलन को गहरा और व्यापक करने में  नजर आती है। लोकतंत्र की सफलता वास्तव में जनता की जागरूकता पर निर्भर करता    है।  भ्रष्टाचार  के खिलाफ खड़े हुए मौजूदा राजनितिक दलों की रीति-निति से असंतुस्ट जनता के सामने सवाल खड़ा था .... कि नए सिरे से उस रणनीति की खोज जिसमे देश खुल कर सांस ले पाएगा  .....लेकिन सब ख़त्म  ... अन्ना की भूतपूर्व पार्टी के अलख में कल्पना की जाने लगी थी कि   जनता के नारे नहीं  उछाले जायेंगे  बल्कि आम आदमी की सुनी भी जाएगी  ...देखा जाए तो  दोनों एक दू सरे के  विरोधी  नहीं बल्कि  पूरक हैं। बेहतर तो यही होता कि सभी  यानि किरण  जैसी कानूनी जानकार  अन्ना जैसे तजुर्बेकार समाजसेवक , केजरीवाल जैसे प्रखर राजनीतिज्ञ और  विश्वास जैसे बुद्दिमान युवा नेता ,और कई   ईमानदार देशभक्त की फौज एक साथ होती  तो यह पार्टी सम्पूर्ण और विश्वसनीय  होती ।  ------------           अवन्तिका झा 

Saturday, October 6, 2012

pm in waiting...

pm in waiting... जी हां एक और  विवाद जो आज से पहले भारत के इतिहास में इतनी जटिल नहीं हुई थी। यूं तो दो शीर्ष पार्टियों के बीच का संघर्ष काफ़ी पुराना हो चला है, लेकिन इस मुद्दे पर बीजेपी और कांग्रेस का अंतरकलह अब खुलकर सामने आने लगा है। ख़ासकर तीन खेमों में बंटते  देश के लिए आज चिंता का सवाल बना हुआ है। बीजेपी में पीएम की फ़हरिस्त काफी लम्बी चल पड़ी है। नरेन्द्र मोदी, अरुण जेटली, गडकरी और अब सुषमा स्वराज के नाम पर बीजेपी में  अंतर्कलह जारी  है। कांग्रेस और जेडीयू से दो-दो हाथ करता बीजेपी आज अपने ही घेरे में फंसता नजर आ रहा है।आडवाणी का बीजेपी के गद्दावर नेताओं में शूमार की बातें अब पुरानी हो चली थी और लिस्ट में पहला नाम शोराबुद्दीन शेख मामले की वजह से पहले ही रिश्तों में तल्खता आ गयी है। संजय जोशी यूं तो खुलकर सामने आते नज़र नहीं दिख  रहे हैं  लेकिन आतंरिक मतभेद पर उनकी चुप्पी भी  समर्थन करता दिख रहा है। उधर बीजेपी के लिए आतंरिक कलह ही झेल पाना कम नहीं है और ऊपर से जेडीयू के नीतीश से हाथ मिलाना भी मोदी के लिए फायदे का सौदा नहीं जान पड़ रहा है।  नितीश ने  खुले विरोध के जरिये बता दिया है की हाथ मिलने से दिल नहीं मिला करते ....गुजरात विधानसभा में मोदी की गहरी  पैठ होने का दावा पूरा गुजरात करता है , लेकिन नीतीश का अपने खेमे से बाहर  गुजरात में  घुसपैठ से मोदी भी पेशोपेश में नज़र आ  रहे हैं।  यूं तो बीजेपी और कांग्रेस अपने  वायदों की आर में  स्वार्थ की रोटी          पकाने को तैयार हैं। डीजल-पेट्रोल की दामों  में रियायत और सस्ते  कम्पूटर  को लेकर  जनता को  अपनी और खींचने का प्रयास  जारी है। उधर  बीजेपी भी सस्ते फ्लैट और सौ गज जमीन देने की बात कह रहा है.  दोनों शीर्ष पार्टियों में आर-पार की लड़ाई कायम हैं मोदी के गुजरात दंगे से सनी धूमिल चेहरे के साथ सुषमा राग भी अब नयी मुश्किल  हैं। अरुण , जेटली तो पहले से ही  लिस्ट में  शुमार थे पर   संघ मोदी का पिछले दीवार से साथ देता दिख रहा है। मोदी ने लगभग अपने सारे पत्ते खोल दिए हैं मोदी का अटल चाल यानी गुजरात के 150 जगहों पर बुलेटप्रूफ रथ में दौरा और युवा मतदाताओं को झांसे में लेने की कोशिश इस बार की  नयी नीतियों में शामिल है। बहरहाल गुजरात विधानसभा चुनाव का ऊट किस करवट बैठेगा यह तो कह पाना मुश्किल  है, लेकिन यह कलह  एक सफल परिणाम तो अवश्य  दिखाएगी यह उम्मीद तो गुजरात की जनता कर ही सकती है।      अवंतिका