अपनी साख पर इतराने के हक़ से वंचित हिंदी .... का हाल भारत के उस उत्तरपूर्वी प्रदेश की तरह से नजर आता है जो अलग -थलग दिखाई देती है। मसलन विश्वविद्यालयों को आवंटित राशि में हिंदी अध्धयन की किताबों पर राशि की कमी और कम्प्यूटरीकृत कॉलेजों को मिलने वाली राशि अघोषित है। उत्तर भारत में हिंदी की जड़ें मजबूत तो हैं लेकिन बाज़ार में अंग्रेज़ी से प्रतिस्पर्धा करता हिंदी आज के पीढी की सबसे बड़ी परेशानी है। शिक्षा एक आधिकारिक कानून के तौर पर खड़ा तो है लेकिन इसकी स्थिति स्वस्थ्य नहीं है। उदाहरण के तौर पर बच्चों में अभिव्यक्ति की कला के साथ अन्य भाषायों का अंतर्विरोध बच्चे के मासूम मन पर सवाल छोडता है कि बाजारी प्रतिस्पर्धा और अंतराभिव्यक्ति का द्वंद आखिर न ख़त्म होने वाला प्रश्न है। कोठारी साहब की अध्यक्षता में बना त्रिशिक्षा फोर्मूलें की सिफारिश सराहनीय है। क्योकिं अभिव्यक्ति के लिए मातृभाषा ,अभिव्यक्ति और ज्ञान विज्ञान के लिए राष्ट्रभाषा और ज्ञान विज्ञान और बाजारी प्रतिस्पर्धा के लिए अंग्रेजी का साथ आवश्यक है। पत्रकारिता ने हिंदी प्रचार प्रसार में अहम् भूमिका निभाते हुए देश और विदेशों में झंडे तो गाडे लेकिन बोलचाल वाली हिंदी अब पत्रकारिता के नए विषय में शामिल हो चुकी है। क्लिष्ट हिंदी अनिवार्य नहीं है लेकिन समृद्ध हिंदी से दूरी मीडिया ने अवश्य करवा दी है।।खासकर उपाधियों और उपमाओं के तौर पर हिंदी का हाल एक मरीज़ की तरह हो चला है। मनोरंजन जगत में भी हिंदी का पूर्ण आधिपत्य या वास्तविक स्वरुप देखने को कम ही मिलता है। बहरहाल, मेरी अपनी समझ के अनुसार किसी भी वस्तू, या माध्यम से प्रेम उसे
समृद्ध बनाने में पहले कदम की तरह काम करता है बाद में हिंदी माध्यम का
समृद्ध और बाजारीकरण स्वयं हो जाना निर्विवाद है।
Sunday, September 23, 2012
Friday, September 21, 2012
HINDI PAR VISHESH 1
भारतीय ज़ज्बात के संचार का साधन हिंदी जी हां राष्ट्रभाषा की उपाधि लिए अपने अस्तित्व को बचा पाने में असफल हिंदी को इस दौर में काफ़ी मुश्किलों से दो -चार होना पर रहा है . अवसर की समानता मोटे तौर पर या नाममात्र के लिए मौजूद तो है ,लेकिन भीतर बडी विसमताओं से व्याप्त हिंदी एक वर्गीय विभाजन का ग्रास बना हुआ है .अपनी अधिकारिकता को जमीनी हकीकत से दूर पाता हिंदी खंडित भाषाओं की कतार में है। ..विविधताओं में एकता इसके लिए कहीं न कहीं जिम्मेवार दिखता है ....क्षेत्रीय भाषाओँ के जाल में और नए राज्य भाषाओं की राजनीति में हिंदी को गहरा शिकार होना पडा है।हिंदी के निर्माताओं में भारतेंदु हरिश्चंद्र उन चुनिन्दा रचनाकारों में शुमार किये जाते है जिन्होंने अपनी वैचारिकता और चिंतन से हिंदी को सृजनात्मक रूप दिया . उस वक्त के सभी चिंतकों ने अपने निबंध, कथा, नाटक, और समालोचनओं से हिंदी साहित्य को विविध नवीन और व्यापक रूप प्रदान किया। 60 करोड़ लोगों की भाषा होने के साथ दुनिया की दूसरी और तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में शुमार है हिंदी । प्रारंभिक अवस्था में हिंदी का उर्दू और शुद्ध हिंदी को आज देवनागरी लिपि में स्वीकारा जा चूका है लेकिन आज भी इसे प्रतिस्पर्धा के तौर पर नहीं रखा गया है।भारत के दक्षिण, उत्तर-पूर्व, पश्चिम हर जगह अपनी भाषाओं का भारत में बोलबाला है और इन सबके बीच हिंदी अपना दम तोडता नज़र आ रहा है। बंगाल में बंगाली, उत्तर-पूर्वी राज्यों में पाश्चात्य का बोलबाला , दक्षिण भारत में प्रादेशिक भाषाओं के बीच हिंदी अपनी साख खोता नज़र आता है। हिंदी के इतिहास और समृद्धि के तौर पर हिंदी जानकारों का मानना है की हिंदी को ही आधिकारिकता और समावेशी होना चाहिए , लेकिन यह संघर्ष हिंदी के मूल में भी शामिल था। जब अच्छे बुद्धिजीवियों ने भी इसकी पैरवी की थी। हिंदी में शोध ,अच्छे लेखन, और अध्धयन सामग्री की कमी भी हिंदी को हाशिये की और धकेल रहा है।जो नीतियाँ बने वे मुख्यतः उच्चतर नवधनिक वर्ग को ही पूरा समाज मानकर चलाई जा रही है।
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